trolley times newspaper

Trolley Times Newspaper

Trolley times | ਟਰਾਲੀ ਟਾਈਮਜ |ਅੰਦੋਲਨ ਦੀ ਆਪਣੀ ਆਵਾਜ਼ | VOICE OF KISAN PROTEST 2020 |

Trolley Times Newspaper English latest edition

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Trolley Times Newspaper Punjabi latest edition

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TROLLEY TIMES 5TH EDITION (5 JANUARY 2020)

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Trolley Times 4th Edition (31 December 2020 Punjabi Edition)

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Trolley Times 3rd edition (26 December 2020 Punjabi Edition )

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Trolley Times 2nd edition (22 Dec 2020 Punjabi Edition)

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Trolley Times 1st edition (18 Dec 2020 Punjabi Edition)

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Trolley Times 1st English edition.

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Trolley Times Newspaper India

‘Media not portraying us well’, so farmers print Trolley Times — their own newsletter

The first edition of bi-weekly Trolley Times has three long-form articles, features, photos, illustrations and a Hindi section for agitators from states other than Punjab.

On Friday morning, as the ongoing farmers’ protest entered its 23rd day, those stationed at the Singhu and Tikri borders of the national capital woke up to the first-ever issue of a bi-weekly newsletter, exclusively by and for the protesters.

Inquilaab di talwar vichaaran di saan tey tez hondi ae (the sword of revolution is sharpened at the whetstone of ideas, a quote by Bhagat Singh),” read one of the lead headlines of the bilingual newsletter that has been named Trolley Times.

Born out of a late night conversation four days ago among some artists on a tractor-trolley at Singhu, it aims to touch every single corner of the kilometres-long agitation at Delhi’s borders and ensure that the message from the stage, latest developments in talks with the government and other such reports are easily accessible to the agitating farmers.

The first edition of the Trolley Times has three long-form articles and features in Gurmukhi, and photos, illustrations and a Hindi section for agitators from states other than Punjab.

“We reached here on 26 November and soon after the national media began calling us terrorists or Khalistani. But we are not those people at all. We are very attached with how to make this a peaceful protest,” Narinder Singh Bhinder, a theatre artiste from Patiala on board whose trolley this idea came to life, told ThePrint.

Protests at Delhi’s borders have only intensified in the weeks since 26 November seeking a repeal of the three central farm laws introduced earlier this year. With an estimated 3 lakh people now on both Singhu and Tikri borders, Bhinder believes it is getting harder to make sure everyone is apprised of the situation.

“While there is a huge crowd in front of the stage where discussion and conversations take place, there are many who don’t always turn up there and thus may miss out on some information. As it is, the national media hasn’t been portraying us well,” Bhinder said.

How first edition of Trolley Times was created

Using social media and WhatsApp to spread the word and garner content for the bi-weekly newsletter, the proposal for the newsletter received “overwhelmingly positive” response.

“We got some 300-400 emails and even more content on WhatsApp. We reviewed a lot of poetry, songs and short stories on how people are involved in this movement,” Gurdeep Dhaliwal, a documentary photographer and writer who is part of the newsletter team, told ThePrint. “The final page even has an illustration from a Kolkata-based designer.”

The four pages include content not just in Gurmukhi, but also in Hindi.

“We have kept it bilingual so narratives from Ghazipur and Shahjahanpur can also be included. There is one article about the farm laws by AIKM (All India Kisan Mahasabha) leader, Purushottam Sharma, there is one student perspective as well by former JNU president Geeta Kumari who is from Haryana and a piece from a young activist from Jaipur, Rahul, on how farmers from states like Rajasthan, Haryana and Gujarat have mobilised,” said Navkiran Natt, student youth activist and film scholar who handled the Hindi translation in the newsletter.

As swiftly as the team collected content for the paper, a masthead design was also created and shared.

“I reached out to two artists in Delhi, Thukral and Tagra, who said they will design the masthead of the newsletter for free. Within two hours, they sent me an editable file, so I just adjusted all the content into it,” Dhaliwal said.

While the team couldn’t get an input from the Ghazipur border protest site, Natt said their aim for the next edition is to include everyone.

With dark blue text and off-white paper, the first edition of Trolley Times was printed Thursday morning and reached Singhu and Tikri borders late in the night. It was distributed among protesting farmers Friday morning.

“It cost us Rs 12,000 to print 2,000 copies. It was entirely community funded. We got it done in Delhi and were sure about using good quality paper,” Dhaliwal said.

Judaange, Ladaange, Jeetange! (United, we will fight and win)” reads Trolley Times’ front-page headline in Gurmukhi. As the protest continues amid deadlock with the Centre, Dhaliwal and Bhinder believe this newsletter will quell the lack of faith farmers have in mainstream media.

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17 thoughts on “Trolley Times Newspaper”

    1. Dr. Pawan Kumar Aryan

      ਤੁਹਾਦੇ ਮੁੰਹ ਚ ਘ੍ਯੋ-ਸ਼ੱਕਰ, ਧ੍ਰੁਵ .

      ਪੈਸ਼ ਹੈ

      संघी-मनुवादी सरकारो की आड़ मे डबल्यूटीओ, अंबानी-अदानी का षड्यंत्र किसानो की जमीनों पर डाका, किसानी अधिकारो पर काले बादल

      किसान संगठनों ने बीज-कीटनाशक-खाद उद्योगो की लूट का पर्दाफाश किया तो संघी-सरकार इन लुटेरो के साथ खड़ी हो गई, अंबानियों को फायदा पहुंचाने और किसान अधिकारों को कम करने के लिए दस्तावेजों की परिभाषा में बदलाव किया जा रहा है।
      असल मे वह इंसान जो खेती-प्रबंधन करता है या फिर खेत का मालिकाना हक रखता है, वह किसान है। यह किसान (फार्मर) परिभाषा है।
      सरकार किसान को कैसे परिभाषित करती है?— राज्यसभा में 22 नवंबर, 2019 को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसान की परिभाषा पूछे जाने पर अपने लिखित जवाब में कहा कि यह राज्य का विषय है, केंद्र किसानों को हर संभव मदद देती है। इस बयान के साथ केंद्रीय कृषि मंत्री ने किसान की कोई परिभाषा नहीं बताई। यह सवाल राज्यसभा सदस्य अजय प्रताप सिंह ने पूछा था। किसानों की परिभाषा के बाद अब किसानों के अधिकारों को कमतर बताने वाला विवादित कानून थोप दिये गए ।
      इन कानूनों के वकीलो द्वारा तयार भ्रामक नामकरण सूप्रीम कोर्ट को बहुत अच्छे लगते है और किसानो को इनमे उलझा कर भयावह स्थिति मे किसानो को धकेल दिया है। कानून के नाम तय करता है संघ द्वारा संचालित “कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण (पीपीवीएंडएफआर)”।
      पीपीवी एंड एफआर ने अपनी वेबसाइट बुकलेट अपलोड किया था, जो कि अब हटा लिया गया है। जीन कैंपेन की ओर से विशेषज्ञ समिति के कई जानकारो किसान अधिकारों को कमतर करने वाली भाषा का इस्तेमाल करने को एक सोची-समझी जानबूझकर कर चली गई चाल करार दिया था । यह किसानो के अधिकारों पर हमला है। किसान की परिभाषा और किसानों के अधिकार की व्याख्या प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वेराइटीज एंड फॉर्मर्स राइट्स एक्ट, 2001 के विरुद्ध है। यह एक्ट सभी किसानों के अधिकारों का संरक्षण करता है। समूचे देश में किसी भी जगह का किसान अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सकता है।
      किसान संगठनों का आरोप सीधा है कि अंबानी-अदानी जैसी ईस्ट-इंडिया-कंपनी को को फायदा पहुंचाने और किसान अधिकारों को कम करने के लिए यह किया जा रहा है। भारत का संविधान किसानों को कोई छूट नहीं देता बल्कि अधिकार देता है। छूट की भाषा विभिन्न डबल्यूटीओ और वर्ल्ड बैंक के कारकून देश की सरकारों के बीच एक संगठन यूनियन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ फर्म्र्स एंड न्यू वेराइटीज ऑफ प्लांट्स etc करता है। जबकि भारत इस संगठन का सदस्य भी नहीं है।
      डॉ सुमन सहाय जो जीन कैंपेन की अध्यक्ष है इस बात की ताकीद करती है संघी सरकार द्वारा कृषि कानून जानबूझकर कर लाये गए है। लखखा सिधाना की सोच भी इस बारे कतई साफ़-सुधरी और नेक है। किसानों के लिए बने मजबूत अधिकारों को उद्योगों के जरिए चोट पहुंचाने की कोशिश बीजेपी की संघी सरकार कर रही है। दुर्भाग्यवश हमारे बिकाऊ hydrocephalous, कॉपी-केट वैज्ञानिक भी बहुत ही आसानी से कंपनियो के लालच मे बिक जाते हैं। किसानो के अधिकारो में की गई छेड़छाड़ उद्योग को रास आती है।
      झूठ के जवालामुखी ‘मोदी’ के अपने सुबे गुजरात की जतन ट्रस्ट ने पेप्सिको इंडिया पर किसान अधिकारों के हनन का आरोप लगाया था। इस मामले में आरएसएस के भारतीय किसान संघ ने पीपीवी एंड एफआर को पत्र भेज कर कंपनी के कानूनी अधिकारों को सीमित करने की मांग की थी। यह कहा था है कि कंपनिया लगातार किसान व उसके अधिकारों के खिलाफ काम कर रही है। परंतु ऐसी कंपनियो के खिलाफ कोई कार्रवाई आज तक नहीं हुई, इसलिय आरएसएस का संघी किसान संगठन चुप और मूर्छित है। गुजरात समेत उत्तर भारत में आलू पैदा करने वाले किसानों के खिलाफ पेप्सिको इंडिया की मनमानी बदस्तूर जारी है।
      जब मौजूदा काले कानूनों कि इबारत लिखी जा रही थी तभी जून 2019 में पेप्सिको इंडिया ने किसानों के खिलाफ हजारो मुकदमे दर्ज कराए थे। वकीलो-अदालतों के खूनी खेल के बाद से आलू किसान काफी दुविधा में आ गए हैं। अदालतों के मकडजाल मे उलझा कर किसानो की जमीने नीलाम होने के कगार पर है ।
      दिल्ली के बार्डर पर किसानो का मौजूदा संघर्ष/सत्याग्रह न केवल इन आलू किसानों को प्रोत्साहित कर रहा है बल्कि आने वाले सुखद भविष्य का ख़ाका तयार किया जा रहा है ।
      पेप्सिको इंडिया ने किसानों से औपचारिक कांट्रेक्ट करार करके, स्थानीय कोल्ड स्टोरेज को वेंडर बनाकर किसानों को परेशान करके, अपने निर्धारित किसानों से भी आलू की खरीद नहीं करती है। किसानों को कम गुणवत्ता वाले आलू बताकर न सिर्फ उन्हे अदालतों मे घसीट रही है परंतु कंपनी के गुंडे किसानो को परेशान कर रहे है ॰ आलू से भरे ट्रकों को भी वापस किसानो के घरो मे भेज कर अत्याचार जारी है, किसानों के विरोध के बावजूद संघी-सरकार की तरफ से समीक्षा के अलावा कोई ठोस बयान नहीं आया है।
      ‘भारत की अर्थनीति: गांधीवादी रूपरेखा’ पुस्तक में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के लेख के अंश आज भी प्रासंगिक हैं:
      “दुर्भाग्य से जो भारत लगभग 1925 तक खाद्यान्नों का निवल निर्यात करता था, (1943 के) बंगाल दुर्भिक्ष के बाद से वह उनका आयात करने लगा है। 1970 तक के बीस वर्ष में खाद्य-सामग्री के आयात पर हमें औसतन 207.8 करोड़ रुपया प्रतिवर्ष खर्च करना पड़ा। और 1970 के बाद के पांच वर्षों में अर्थात 1971-76 में इस मद में खर्च बढ़कर 441.14 करोड़ वार्षिक हो गया। 1974, 1975 तथा 1976 के तीन वर्षाें की अवधि में ही 187,96,000 मीट्रिक टन खाद्यान्न का आयात किया गया, जिसका मूल्य 2,503 करोड़ रुपए हुआ। (इसमें 461 करोड़ रुपये किराया भी सम्मिलित है।)
      इसमें भारत-अमेरिकी समझौते, विश्व खाद्य कार्यक्रम, केयर इत्यादि के समान कार्यक्रमों के अन्तर्गत उपहार के रूप में प्राप्त खाद्य सम्मिलित नहीं है। 1965-67 के दो वर्षों के दौरान 45,76,000 मीटरी टन गेहूं भेंट के रूप में मिला। 1975 में केवल कनाडा से 37.8 करोड़ रुपये मूल्य का 2,50,000 मीटरी टन गेहूं भेंट में मिला। हमें केवल खाद्यान्न ही नहीं, कृषि से प्राप्त होने वाले कच्चे माल का भी आयात करना पड़ा—मिसाल के लिए, कपड़ा, भोजन के बाद मनुष्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक वस्तु है, उसके उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चा माल भी हमें बाहर से मंगाना पड़ा। 1971-72 तक विश्व मण्डी में लम्बे रेशे की कपास के मुख्य खरीदारों में भारत की गिनती होती थी।
      विकासोन्मुख कृषि से उत्पन्न अतिरिक्त खाद्य-पदार्थ व कच्चा माल हमें विदेशी मुद्रा कमाने में बहुत मदद दे सकते हैं और इस विदेशी मुद्रा से हम औद्योगिक विकास के लिए पूंजीगत माल का आयात कर सकते हैं—ऐसे पूंजीगत माल का जिसकी आवश्यकता हर देश को होती है चाहे उसकी अर्थव्यवस्था कैसी भी हो। कनाडा ने अपने उद्योगों का निर्माण इमारती लकड़ी का निर्यात करके किया था और जापान ने रेशम का निर्यात करके।
      सत्तारूढ़ दल ने यद्यपि कृषि की उपेक्षा की, फिर भी 1974-75 तक में हमारे देश से निर्यात हुए मुख्य माल का पूरा दो-तिहाई ऐसा माल था जो कृषि की उपज था—कच्ची उपज तथा प्रक्रमणित माल मिलाकर। कृषि में मत्स्य, वन तथा पशुपालन क्षेत्र के उत्पाद शामिल हैं। उस वर्ष हमारे देश से निर्यात हुए माल का 79 प्रतिशत ऐसा माल था जिसे हमारे यहां का मुख्य निर्यात-माल कहा जाता है और शेष 21 प्रतिशत ऐसा निर्यात था जिसे छोटा-मोटा समझना चाहिए। इस छोट-मोटे निर्यात में कृिष व कृषितर दोनों क्षेत्रों का ही माल था। 1950-51 में मुख्य निर्यात का 77 प्रतिशत कृषि का उत्पाद था और छोटा-मोटा निर्यात 23 प्रतिशत था।
      इसके अतिरिक्त, औद्योगिक विकास भी तभी हो सकता है जब कृषि में समृद्धि हो या बहुत हुआ तो दोनों साथ-साथ हो सकते हैं। लेकिन औद्योगिक विकास पहले हो, बाद को कृषि में खुशहाली आये—यह नहीं हो सकता। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जिस राजनीतिक दल ने देश पर तीस वर्ष तक शासन किया उसकी नेताशाही समझती थी और शायद अभी तक समझती है कि औद्योगिक विकास पहले हो सकता है। जब कृषक के पास क्रय-शक्ति हो तभी औद्योगिक व कृषीतर क्षेत्र के माल व सेवाओं (जैसे शिक्षा, परिवहन, विद्युत) की मांग पैदा हो सकती है।
      क्रय-शक्ति कृषि की उपज बेचकर ही उत्पन्न हो सकती है—चाहे बिक्री देश में हो या चाहे देश के बाहर। जितना अधिक बिक्री के लिए अतिरिक्त उत्पादन होगा, उतनी ही बेचने वाले अथवा कृषि के उत्पादक की क्रय-शक्ति बढ़ेगी। जहां जनसाधारण की क्रय-शक्ति नहीं बढ़ती, अर्थात जहां कृषकों के उपयोग से अधिक अतिरिक्त उत्पादन नहीं होता, वहाँ कोई औद्योगिक संवृद्धि नहीं हो सकती।
      कृषि विकास से एक ओर तो जन-समुदाय को क्रय-शक्ति मिलेगी, जिससे वह तैयार माल व सेवाएं खरीद सकेंगे, दूसरी ओर कामगारों को अवसर मिलेगा जिससे वे औद्योगिक तथा रोजगार कर सकें”।

      35 दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर धरने देकर देशला के लाखो किसानो द्वारा तीन काले कृषी-कानूनों को रद्द किए जाने की पुर-अमन मांग

      केंद्र की संघी सरकार द्वारा पारित 3 कृषी काले कानूनों को रद्द किए जाने की मांग लेकर पिछले 35 दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर बैठे किसानों के साथ केंद्र सरकार षड्यंत्र रच रही है। इसी क्रम मे वकील महमूद प्राचा के दफ्तर पर भी तस्सुद ढाया गया था। तीन काले कानूनों के अलावा प्रस्तावित बिजली कानून, पराली जलाने के कानून भी किसानो के खिलाफ लाये गए है।
      किसानो के पुर-अमन इजलास मे एमएसपी गारंटी कानून लाने और तीन काले कृषि कानूनों को ख़ारिज करने का मद है । किसान मांग कर रहे हैं कि सरकार अपना हठ छोड़े. तीनों काले कानून खत्म करें और इसके बाद नए सिरे से किसान मजदूर को नए साल की सौगात दें। केंद्र और हरियाणा प्रदेश की संघी भाजपा सरकारें किसानो से पंगा लेकर जनता के बीच विश्वास खो चुकी है।
      आज भारत देश के किसान का बेटा जाग चुका है, अब वह कृषि को घाटे का सौदा नहीं बनने देगा। शिक्षित और पढ़े-लिखे किसान कृषि के कार्य को छोटा नहीं समझते है। संघी सरकार के काले कानूनों के चलते पूरे साल मेहनत करके भी किसान ठोकरे खाता है, प्राइवेट मंडियो ने तो सरकारी मंडियो को खत्म करने की साजिश बुन ली है। कागजो में सरकारी क्रय केंद्र कई जगहों पर बने हुए है, लेकिन हकीकत में वहाँ पर कोई खरीददारी नही होती है।
      संघी सरकार के कृषि नियम और कानून अंबानी और अदानी के लिए बने है। किसान शिकायत भी नहीं कर सकता, अधिकारियों मे कुछ ही ईमानदार ऑफिसर है जो सच के लिए और किसानों के लिए लड़ाई लड़ने दिल्ली के बार्डर पर आ डटे है। संघी सरकारो के एजंडे को किसान समझ चुका है, लुटेरी कंपनियो के मकडजाली सिस्टम को खत्म करने के लिए सबको मिलकर लड़ना होगा।
      अंबानी के टुकड़ो पर पलने वाली सांघी सरकार को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि सरकार किसान और देश की जनता इसलिए बनती है ताकि आम जनता और किसानों का भला हो। अंबानी की प्राइवेट कंपनी या माल्या की कोई अन्य संस्था अपने लाभ के लिए देश छोड़ कर भाग सकती है। नागरिकों और किसानो के विकास और कल्याण के लिए प्राइवेट कंपनियों को आगे न लाकर सरकारो को खुद सामने आना होगा। क्योंकि बाबा साहब अंबेडकर के संविधान पर जनता आज भी विश्वास करती है। आम नागरिक और किसान की हालत तब सुधरेगी जब उनके बच्चों को मुफ्त में शिक्षा और स्वास्थ्य की उचित भोजन व्यवस्था मिलेगी।
      यही आगाज़ किसानो ने कर दिखाया है और जब तक जनता जागरूक होकर खड़ी न हो जाए तब तक संघियो-अंबानियों की फूट-डालो राज-करो की नीति को नेस्तांबूद करती रहेगी ।

      कफ़न-चोर कफ़न बेचता है, ये गद्दार माली चमन बेचता है।
      बनाया था हमने मसीहा जिसे, वो दिल्ली मे बैठा वतन बेचता है ॥

      डा॰ पवन कुमार आर्यन
      30-12-2020

  1. Pingback: Farmers Protest Timeline - Techaroundworld.com

  2. Can we have updates on all the people got Shaheed on this protest with dates? And if you don’t mind can we have English version too? Because we can read Hindi Punjabi nd English, but the whole world cannot read Punjabi.so just a small request.
    Rest we appreciate your efforts.
    Regards
    Waheguru bless us all, bless us Unity.

  3. ਸ਼ਾਬਾਸ਼ ਪੰਜਾਬ !
    ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਆਬੋ-ਹਵਾ ਵਿੱਚ, ਕੁਝ ਨਾ ਕੁਝ ਤਾਂ ਖਾਸ ਹੈ ।
    ਕਲਮ ਨਹੀਂ ਕਿਰਪਾਨ ਲਿਖਿਆ, ਏਸ ਦਾ ਇਤਿਹਾਸ ਹੈ ।।
    ਇਰਾਨੀਆਂ,ਦੁਰਾਨੀਆਂ,ਅਫਗਾਨੀਆਂ ਦੀ ਗੱਲ ਕੀ ,
    ਹਰ ਸਿਕੰਦਰ ਥੰਮ ਲੈਣਾ , ਏਸ ਦਾ ਅਭਿਆਸ ਹੈ ।
    ਹਰ ਮਨੁੱਖੀ ਮੁਢਲੀਆਂ ਲੋੜਾਂ ਨੂੰ ਇਹ ਹੈ ਪੂਰਦਾ,
    ਭਲਾ ਹੀ ਸਰਬੱਤ ਵਾਲਾ ਏਸਦਾ ਧਰਵਾਸ ਹੈ ।
    ਅਣਖ ਦੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਲਈ ਹਿੰਮਤ ਜੁਟਾਵਣ ਵਾਸਤੇ,
    ਛਾਤੀ `ਚ ਹਵਾ ਭਰਨ ਲਈ, ਕਰ ਜਾਂਵਦਾ ਪਰਵਾਸ ਹੈ ।
    ਆਪ ਤਾਂ ਹਰ ਹਾਲ ਵਿੱਚ ਇਹ ਰਜਾ ਕਹਿਕੇ ਮਸਤ ਹੈ,
    ਪਰ ਪਰ-ਉਪਕਾਰ ਲਈ ਇਹ, ਦਾਸਾਂ ਦਾ ਵੀ ਦਾਸ ਹੈ ।
    ਏਸਦਾ ਨੁਕਸਾਨ ਕਰਦੀ ਬੇ-ਪਰਵਾਹੀ ਏਸ ਦੀ,
    ਐਪਰ ਜਦ ਵੀ ਜਾਗਦਾ ਫਿਰ ਹਰ ਅੜਿੱਕਾ ਪਾਸ ਹੈ ।
    ਏਸਦੀ ਮਿਹਨਤ ਦੇ ਝੰਡੇ ਜਗਤ ਵਿੱਚ ਨੇ ਝੂਲਦੇ,
    ਏਸ ਦਾ ਸੰਘਰਸ਼ ਹੀ ਅੱਜ ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਆਸ ਹੈ ।
    ਏਸਦੇ ਦੁਸ਼ਮਣ ਵੀ ਭਾਵੇਂ ਰਹਿ ਸਕੇ ਨਾ ਸਿਫਤ ਬਿਨ,
    ਬਖਸ਼ਿਆ ਇਖਲਾਕ ਇਸਨੂੰ ,ਮਾਨਸਿਕ ਵਿਕਾਸ ਹੈ ।
    ਏਸਦੀ ਫਿਤਰਤ ਨੂੰ ਤੱਕਕੇ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਇੰਝ ਹੁਣ,
    ਜਮ-ਪਲ਼ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ,ਮੁਹਿੰਮਾਂ ਦਾ ਆਗਾਜ਼ ਹੈ ।
    ਏਸਦਾ ਤਾਂ ਭੋਲ਼ਾਪਣ ਵੀ ਏਸ ਲਈ ਜੰਜੀਰ ਹੈ,
    ਤਾਹੀਓਂ ਰਾਜਨੀਤਕਾਂ ਨੇ ਕਰਿਆ ਹਿਰਾਸ ਹੈ ।
    ਏਸਦੇ ਵਿਓਹਾਰ ਕੋਲੋਂ ਅੰਦਰੋਂ ਭੈ-ਭੀਤ ਹੋ,
    ਰੱਖਣਾ ਗੁਲਾਮ ਇਹਨੂੰ ਹਕੂਮਤੀ ਪਰਿਆਸ ਹੈ ।
    ਹੱਕ,ਸੱਚ,ਅਣਖ ਤੇ ਇਨਸਾਫ,ਸੇਵਾ ਭਾਵਨਾ ,
    ਜੱਗ ਤੇ ਰੱਖੂਗਾ ਜਿੰਦਾ,ਏਸ ਨੂੰ ਸ਼ਾਬਾਸ਼ ਹੈ ।।
    ਡਾ ਗੁਰਮੀਤ ਸਿੰਘ ਬਰਸਾਲ (ਯੂ ਐਸ ਏ)

  4. ਇਹ ਬਹੁਤ ਸ਼ਲਾਘਾਯੋਗ ਉਪਰਾਲਾ ਹੈ ,ਇਕ ਨਵੀਂ ਸੋਚ ਦਾ ਆਗਾਜ਼। ਨਿਧੜਕ, ਨਿਰਪੱਖ ਤੇ ਸਹੀ ਪੱਤਰਕਾਰਤਾ ਦੀ ਮਿਸਾਲ।
    Our voices will reach and connect to all those who want to know the ground reality. This will further motivate people and strengthen the andolan .

  5. Dr. Pawan Kumar Aryan

    It is most effective and required initiative. Despite we are wrapped in a jungle of e-media, print media has woven in our DNA.
    Kudos and Bravo.

  6. Dr. Pawan Kumar Aryan

    संघी-मनुवादी सरकारो की आड़ मे डबल्यूटीओ, अंबानी-अदानी का षड्यंत्र किसानो की जमीनों पर डाका, किसानी अधिकारो पर काले बादल

    किसान संगठनों ने बीज-कीटनाशक-खाद उद्योगो की लूट का पर्दाफाश किया तो संघी-सरकार इन लुटेरो के साथ खड़ी हो गई, अंबानियों को फायदा पहुंचाने और किसान अधिकारों को कम करने के लिए दस्तावेजों की परिभाषा में बदलाव किया जा रहा है।
    असल मे वह इंसान जो खेती-प्रबंधन करता है या फिर खेत का मालिकाना हक रखता है, वह किसान है। यह किसान (फार्मर) परिभाषा है।
    सरकार किसान को कैसे परिभाषित करती है?— राज्यसभा में 22 नवंबर, 2019 को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसान की परिभाषा पूछे जाने पर अपने लिखित जवाब में कहा कि यह राज्य का विषय है, केंद्र किसानों को हर संभव मदद देती है। इस बयान के साथ केंद्रीय कृषि मंत्री ने किसान की कोई परिभाषा नहीं बताई। यह सवाल राज्यसभा सदस्य अजय प्रताप सिंह ने पूछा था। किसानों की परिभाषा के बाद अब किसानों के अधिकारों को कमतर बताने वाला विवादित कानून थोप दिये गए ।
    इन कानूनों के वकीलो द्वारा तयार भ्रामक नामकरण सूप्रीम कोर्ट को बहुत अच्छे लगते है और किसानो को इनमे उलझा कर भयावह स्थिति मे किसानो को धकेल दिया है। कानून के नाम तय करता है संघ द्वारा संचालित “कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण (पीपीवीएंडएफआर)”।
    पीपीवी एंड एफआर ने अपनी वेबसाइट बुकलेट अपलोड किया था, जो कि अब हटा लिया गया है। जीन कैंपेन की ओर से विशेषज्ञ समिति के कई जानकारो किसान अधिकारों को कमतर करने वाली भाषा का इस्तेमाल करने को एक सोची-समझी जानबूझकर कर चली गई चाल करार दिया था । यह किसानो के अधिकारों पर हमला है। किसान की परिभाषा और किसानों के अधिकार की व्याख्या प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वेराइटीज एंड फॉर्मर्स राइट्स एक्ट, 2001 के विरुद्ध है। यह एक्ट सभी किसानों के अधिकारों का संरक्षण करता है। समूचे देश में किसी भी जगह का किसान अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सकता है।
    किसान संगठनों का आरोप सीधा है कि अंबानी-अदानी जैसी ईस्ट-इंडिया-कंपनी को को फायदा पहुंचाने और किसान अधिकारों को कम करने के लिए यह किया जा रहा है। भारत का संविधान किसानों को कोई छूट नहीं देता बल्कि अधिकार देता है। छूट की भाषा विभिन्न डबल्यूटीओ और वर्ल्ड बैंक के कारकून देश की सरकारों के बीच एक संगठन यूनियन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ फर्म्र्स एंड न्यू वेराइटीज ऑफ प्लांट्स etc करता है। जबकि भारत इस संगठन का सदस्य भी नहीं है।
    डॉ सुमन सहाय जो जीन कैंपेन की अध्यक्ष है इस बात की ताकीद करती है संघी सरकार द्वारा कृषि कानून जानबूझकर कर लाये गए है। लखखा सिधाना की सोच भी इस बारे कतई साफ़-सुधरी और नेक है। किसानों के लिए बने मजबूत अधिकारों को उद्योगों के जरिए चोट पहुंचाने की कोशिश बीजेपी की संघी सरकार कर रही है। दुर्भाग्यवश हमारे बिकाऊ hydrocephalous, कॉपी-केट वैज्ञानिक भी बहुत ही आसानी से कंपनियो के लालच मे बिक जाते हैं। किसानो के अधिकारो में की गई छेड़छाड़ उद्योग को रास आती है।
    झूठ के जवालामुखी ‘मोदी’ के अपने सुबे गुजरात की जतन ट्रस्ट ने पेप्सिको इंडिया पर किसान अधिकारों के हनन का आरोप लगाया था। इस मामले में आरएसएस के भारतीय किसान संघ ने पीपीवी एंड एफआर को पत्र भेज कर कंपनी के कानूनी अधिकारों को सीमित करने की मांग की थी। यह कहा था है कि कंपनिया लगातार किसान व उसके अधिकारों के खिलाफ काम कर रही है। परंतु ऐसी कंपनियो के खिलाफ कोई कार्रवाई आज तक नहीं हुई, इसलिय आरएसएस का संघी किसान संगठन चुप और मूर्छित है। गुजरात समेत उत्तर भारत में आलू पैदा करने वाले किसानों के खिलाफ पेप्सिको इंडिया की मनमानी बदस्तूर जारी है।
    जब मौजूदा काले कानूनों कि इबारत लिखी जा रही थी तभी जून 2019 में पेप्सिको इंडिया ने किसानों के खिलाफ हजारो मुकदमे दर्ज कराए थे। वकीलो-अदालतों के खूनी खेल के बाद से आलू किसान काफी दुविधा में आ गए हैं। अदालतों के मकडजाल मे उलझा कर किसानो की जमीने नीलाम होने के कगार पर है ।
    दिल्ली के बार्डर पर किसानो का मौजूदा संघर्ष/सत्याग्रह न केवल इन आलू किसानों को प्रोत्साहित कर रहा है बल्कि आने वाले सुखद भविष्य का ख़ाका तयार किया जा रहा है ।
    पेप्सिको इंडिया ने किसानों से औपचारिक कांट्रेक्ट करार करके, स्थानीय कोल्ड स्टोरेज को वेंडर बनाकर किसानों को परेशान करके, अपने निर्धारित किसानों से भी आलू की खरीद नहीं करती है। किसानों को कम गुणवत्ता वाले आलू बताकर न सिर्फ उन्हे अदालतों मे घसीट रही है परंतु कंपनी के गुंडे किसानो को परेशान कर रहे है ॰ आलू से भरे ट्रकों को भी वापस किसानो के घरो मे भेज कर अत्याचार जारी है, किसानों के विरोध के बावजूद संघी-सरकार की तरफ से समीक्षा के अलावा कोई ठोस बयान नहीं आया है।
    ‘भारत की अर्थनीति: गांधीवादी रूपरेखा’ पुस्तक में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के लेख के अंश आज भी प्रासंगिक हैं:
    “दुर्भाग्य से जो भारत लगभग 1925 तक खाद्यान्नों का निवल निर्यात करता था, (1943 के) बंगाल दुर्भिक्ष के बाद से वह उनका आयात करने लगा है। 1970 तक के बीस वर्ष में खाद्य-सामग्री के आयात पर हमें औसतन 207.8 करोड़ रुपया प्रतिवर्ष खर्च करना पड़ा। और 1970 के बाद के पांच वर्षों में अर्थात 1971-76 में इस मद में खर्च बढ़कर 441.14 करोड़ वार्षिक हो गया। 1974, 1975 तथा 1976 के तीन वर्षाें की अवधि में ही 187,96,000 मीट्रिक टन खाद्यान्न का आयात किया गया, जिसका मूल्य 2,503 करोड़ रुपए हुआ। (इसमें 461 करोड़ रुपये किराया भी सम्मिलित है।)
    इसमें भारत-अमेरिकी समझौते, विश्व खाद्य कार्यक्रम, केयर इत्यादि के समान कार्यक्रमों के अन्तर्गत उपहार के रूप में प्राप्त खाद्य सम्मिलित नहीं है। 1965-67 के दो वर्षों के दौरान 45,76,000 मीटरी टन गेहूं भेंट के रूप में मिला। 1975 में केवल कनाडा से 37.8 करोड़ रुपये मूल्य का 2,50,000 मीटरी टन गेहूं भेंट में मिला। हमें केवल खाद्यान्न ही नहीं, कृषि से प्राप्त होने वाले कच्चे माल का भी आयात करना पड़ा—मिसाल के लिए, कपड़ा, भोजन के बाद मनुष्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक वस्तु है, उसके उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चा माल भी हमें बाहर से मंगाना पड़ा। 1971-72 तक विश्व मण्डी में लम्बे रेशे की कपास के मुख्य खरीदारों में भारत की गिनती होती थी।
    विकासोन्मुख कृषि से उत्पन्न अतिरिक्त खाद्य-पदार्थ व कच्चा माल हमें विदेशी मुद्रा कमाने में बहुत मदद दे सकते हैं और इस विदेशी मुद्रा से हम औद्योगिक विकास के लिए पूंजीगत माल का आयात कर सकते हैं—ऐसे पूंजीगत माल का जिसकी आवश्यकता हर देश को होती है चाहे उसकी अर्थव्यवस्था कैसी भी हो। कनाडा ने अपने उद्योगों का निर्माण इमारती लकड़ी का निर्यात करके किया था और जापान ने रेशम का निर्यात करके।
    सत्तारूढ़ दल ने यद्यपि कृषि की उपेक्षा की, फिर भी 1974-75 तक में हमारे देश से निर्यात हुए मुख्य माल का पूरा दो-तिहाई ऐसा माल था जो कृषि की उपज था—कच्ची उपज तथा प्रक्रमणित माल मिलाकर। कृषि में मत्स्य, वन तथा पशुपालन क्षेत्र के उत्पाद शामिल हैं। उस वर्ष हमारे देश से निर्यात हुए माल का 79 प्रतिशत ऐसा माल था जिसे हमारे यहां का मुख्य निर्यात-माल कहा जाता है और शेष 21 प्रतिशत ऐसा निर्यात था जिसे छोटा-मोटा समझना चाहिए। इस छोट-मोटे निर्यात में कृिष व कृषितर दोनों क्षेत्रों का ही माल था। 1950-51 में मुख्य निर्यात का 77 प्रतिशत कृषि का उत्पाद था और छोटा-मोटा निर्यात 23 प्रतिशत था।
    इसके अतिरिक्त, औद्योगिक विकास भी तभी हो सकता है जब कृषि में समृद्धि हो या बहुत हुआ तो दोनों साथ-साथ हो सकते हैं। लेकिन औद्योगिक विकास पहले हो, बाद को कृषि में खुशहाली आये—यह नहीं हो सकता। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जिस राजनीतिक दल ने देश पर तीस वर्ष तक शासन किया उसकी नेताशाही समझती थी और शायद अभी तक समझती है कि औद्योगिक विकास पहले हो सकता है। जब कृषक के पास क्रय-शक्ति हो तभी औद्योगिक व कृषीतर क्षेत्र के माल व सेवाओं (जैसे शिक्षा, परिवहन, विद्युत) की मांग पैदा हो सकती है।
    क्रय-शक्ति कृषि की उपज बेचकर ही उत्पन्न हो सकती है—चाहे बिक्री देश में हो या चाहे देश के बाहर। जितना अधिक बिक्री के लिए अतिरिक्त उत्पादन होगा, उतनी ही बेचने वाले अथवा कृषि के उत्पादक की क्रय-शक्ति बढ़ेगी। जहां जनसाधारण की क्रय-शक्ति नहीं बढ़ती, अर्थात जहां कृषकों के उपयोग से अधिक अतिरिक्त उत्पादन नहीं होता, वहाँ कोई औद्योगिक संवृद्धि नहीं हो सकती।
    कृषि विकास से एक ओर तो जन-समुदाय को क्रय-शक्ति मिलेगी, जिससे वह तैयार माल व सेवाएं खरीद सकेंगे, दूसरी ओर कामगारों को अवसर मिलेगा जिससे वे औद्योगिक तथा रोजगार कर सकें”।

    35 दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर धरने देकर देशला के लाखो किसानो द्वारा तीन काले कृषी-कानूनों को रद्द किए जाने की पुर-अमन मांग

    केंद्र की संघी सरकार द्वारा पारित 3 कृषी काले कानूनों को रद्द किए जाने की मांग लेकर पिछले 35 दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर बैठे किसानों के साथ केंद्र सरकार षड्यंत्र रच रही है। इसी क्रम मे वकील महमूद प्राचा के दफ्तर पर भी तस्सुद ढाया गया था। तीन काले कानूनों के अलावा प्रस्तावित बिजली कानून, पराली जलाने के कानून भी किसानो के खिलाफ लाये गए है।
    किसानो के पुर-अमन इजलास मे एमएसपी गारंटी कानून लाने और तीन काले कृषि कानूनों को ख़ारिज करने का मद है । किसान मांग कर रहे हैं कि सरकार अपना हठ छोड़े. तीनों काले कानून खत्म करें और इसके बाद नए सिरे से किसान मजदूर को नए साल की सौगात दें। केंद्र और हरियाणा प्रदेश की संघी भाजपा सरकारें किसानो से पंगा लेकर जनता के बीच विश्वास खो चुकी है।
    आज भारत देश के किसान का बेटा जाग चुका है, अब वह कृषि को घाटे का सौदा नहीं बनने देगा। शिक्षित और पढ़े-लिखे किसान कृषि के कार्य को छोटा नहीं समझते है। संघी सरकार के काले कानूनों के चलते पूरे साल मेहनत करके भी किसान ठोकरे खाता है, प्राइवेट मंडियो ने तो सरकारी मंडियो को खत्म करने की साजिश बुन ली है। कागजो में सरकारी क्रय केंद्र कई जगहों पर बने हुए है, लेकिन हकीकत में वहाँ पर कोई खरीददारी नही होती है।
    संघी सरकार के कृषि नियम और कानून अंबानी और अदानी के लिए बने है। किसान शिकायत भी नहीं कर सकता, अधिकारियों मे कुछ ही ईमानदार ऑफिसर है जो सच के लिए और किसानों के लिए लड़ाई लड़ने दिल्ली के बार्डर पर आ डटे है। संघी सरकारो के एजंडे को किसान समझ चुका है, लुटेरी कंपनियो के मकडजाली सिस्टम को खत्म करने के लिए सबको मिलकर लड़ना होगा।
    अंबानी के टुकड़ो पर पलने वाली सांघी सरकार को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि सरकार किसान और देश की जनता इसलिए बनती है ताकि आम जनता और किसानों का भला हो। अंबानी की प्राइवेट कंपनी या माल्या की कोई अन्य संस्था अपने लाभ के लिए देश छोड़ कर भाग सकती है। नागरिकों और किसानो के विकास और कल्याण के लिए प्राइवेट कंपनियों को आगे न लाकर सरकारो को खुद सामने आना होगा। क्योंकि बाबा साहब अंबेडकर के संविधान पर जनता आज भी विश्वास करती है। आम नागरिक और किसान की हालत तब सुधरेगी जब उनके बच्चों को मुफ्त में शिक्षा और स्वास्थ्य की उचित भोजन व्यवस्था मिलेगी।
    यही आगाज़ किसानो ने कर दिखाया है और जब तक जनता जागरूक होकर खड़ी न हो जाए तब तक संघियो-अंबानियों की फूट-डालो राज-करो की नीति को नेस्तांबूद करती रहेगी ।

    कफ़न-चोर कफ़न बेचता है, ये गद्दार माली चमन बेचता है।
    बनाया था हमने मसीहा जिसे, वो दिल्ली मे बैठा वतन बेचता है ॥

    डा॰ पवन कुमार आर्यन
    30-12-2020

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